सन्नाटा

सन्नाटा

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हमारी सफ़ेद रंग की मारुती जैसे ही रफ़्तार पकड़ के शिमला से कुफरी की ओर बढ़ी, शरीर में एक ठिठुरन सी महसूस होने लगी. नवंबर की इस सर्दीली शाम के सामने मेरी पतली शाल दुर्बल साबित हो रही थी. मेरा जैकेट गाड़ी की डिक्की में था. दिल्ली से हमने जो ड्राइवर भाड़े पे लिया था वो तेज़ गति से गाड़ी को चला, या लगभग उड़ा ही रहा था. जब मैंने उसे गाड़ी दो मिनट के लिए रोकने को बोला, वो झुंझला उठा. मन मसोस के तक़रीबन २ किलोमीटर आगे पहुंचने के बाद उसने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी परन्तु इंजन फिर भी बंद नहीं किया. मैं ड्राइवर की अधीरता से सहम के, फुर्ती से गाड़ी से उतरी और डिक्की की ओर लपकी. जैसे ही जैकेट को बदन पे लपेटा, भीषड़ ठण्ड से तो राहत मिली परन्तु दम भी घुटने लगा. एक तो छोटी सी गाड़ी जिसके सभी शीशे कोहरे को बाहर रखने के लिए पूर्ण रूप से बंद थे, और ऊपर से पहाड़ी इलाके की वो घुमावदार सड़के जिनपे हमारी मारुती प्रकाश की गति से आगे बढ़ रही थी – मेरा सिर चकराने लगा. ड्राइवर को पुनः रोकने के लिए बोलना उचित नहीं लगा तो मैंने खुद को विचलित करने के लिए अपनी आँखें मूँद ली और यादों के समुन्दर में गोता मारा. बंद नेत्रों के परदे पे पारस के चेहरे का धुंधला प्रतिबिम्ब प्रकट हुआ. यह वही पारस था जिससे मेरी पहली मुलाकात हिमाचल की इन्हीं वादियों में तक़रीबन पांच साल पहले हुयी थी.

सुडौल शरीर, प्यारी मुस्कान, और चंचलता से भरी आँखें थी पारस की, मगर उनके नीचे जो काली झाइयां थी वह न जाने कितनी अनकही बातें अपने अंधकार में समेटे हुयी थीं. पहली ही मुलाकात में मुझे पारस एक समुन्दर के समान लगा, सतह पे एक शिशु की तरह मासूम मगर भीतर से गंभीर और रहस्यमयी. मैं तब कुछ बाईस साल की रही होंगी, रोमानी ख़यालातो वाली, और गुत्थियां सुलझाना तो मुझे बचपन से ही बहुत भाथा था, इसी कारणवश पारस ने मेरा मन मोह लिया. हमारा परिवार गर्मी की छुट्ठियो में हर साल दिल्ली की तपन को पीछे छोड़ किसी पहाड़ी इलाके में पनाह लेता था, यह तो इत्तेफाक की ही बात थी की उस साल पिताजी के अज़ीज़ मित्र, पारस के पिता ने भी कुफरी की बर्फीली पहाड़ियों में अपने परिवार के साथ मई का महीना बिताने की योजना बनाई थी. हर सुबह हम दोनों के परिवार साथ में ही हिमाचल के जंगल, मंदिर, और असीम सुंदरता से परिपूर्ण दृश्यों का लुत्फ़ उठाने निकल पड़ते. जहां सभी परिवारजनों की नज़रे शिमला की हरियाली और दूर क्षितिज के पास खड़े, धूप में पिघलती हुयी बर्फ के अंतिम अवशेषों की सफ़ेद चादर ओढ़े हुए पर्वतो पे होती, वही मेरी नज़र एकटक पारस के ह्रदय तक पहुंचने का प्रयास करती, जबकी पारस तो कहीं और ही होता. वह ना तो शिमला के सौंदर्य से प्रफुल्लित दिखता, ना ही मेरे एकतरफे आकर्षण से वाकिफ़ मालूम देता, पारस अपने ही खयालो में मशगूल रहता, वर्तमान से कहीं दूर, शायद अपने बीते हुए कल की कुछ गलियों में.

हमारे परिवार में बेटियों को अपना वर चुनने पर पाबन्दी थी, इसी कारणवश, मेरी पारस को लेकर उत्सुकता, जो की मेरी माँ की अनुभवी निग़ाहों ने आसानी से भांप ली थी, उनके लिए अपार चिंता का कारण बन गयी. यह चिंता जब उन्होंने पिताजी से व्यक्त करी तो उन्होंने सोचा की इससे पहले की उनकी बागी बेटी कुछ गलत कर बैठे, क्यों ना वह खुद ही मेरे और पारस के रिश्ते का प्रस्ताव पारस के घर वालों के पास लेकर जाएं. रिश्ता एक हफ्ते में पक्का भी हो गया, विवाह की तिथि ३ महीने बाद की तय करी गयी. पता नहीं पारस ने इस रिश्ते के लिए हाँ क्यों कहा, शायद उससे पूछा ही नहीं गया, या फिर वह अपने परिवार वालों के सामने झुक गया.

पारस के आँखों के पीछे छिपा हुआ रहस्य मुझे शादी के बाद पता चला. वह ना तो अतीत की गलियों में खोया हुआ था और ना ही किसी भयावने हादसे का बोझ उठाते हुए जी रहा था. वह तो साहित्य का प्रेमी था, बिना किसी को बताये, आधी रात को उठके कहानियाँ लिखा करता था. वह कभी भी मेरे साथ कोई दुर्व्यहवार नहीं किया, एक पति और एक मित्र का रिश्ता वह बखूबी से निभाता, मगर कभी कभी ऐसा लगता की उसकी कहानी की नायिका उसको मेरे से दूर खींच रही है. जहां मैं उसकी बाहरी मासूमियत और भीतरी गंभीरता, दोनों से मोहित थी, यह अलगाव मुझसे सहा नहीं जाता था. मैं उसकी कहानियों के चरित्रों से मिलना चाहती थी, उसकी वह काली डायरी, जिसमे वह अपने शब्दों से रोचक किस्से बुना करता था, मुझे रोज़ पुकारती थी, शायद मेरा मज़ाक भी उड़ाती थी, शायद यह कहती थी मुझसे कि तुम कितनी भी कोशिश कर लो, पारस के सबसे ज़्यादा करीब तो सदा मैं ही रहूँगी. पूर्णिमा की उस रात जब हमारे बेटे सुहास के जन्म के कुछ घंटे पहले मैं दर्द से तिलमिला के पारस का नाम पुकार रही थी तब भी वह अपनी लाइब्रेरी में अपनी डायरी से गुफ़्तगू कर रहा था. अपनी शब्दों की दुनिया में वह ऐसा खोया हुआ था की उसे मेरा भी होश नहीं था. जैसे तैसे मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और वह एम्बुलेंस लेके घर आयीं, तब जाके पारस इस दुनिया में वापस आया जहां उसके परिवार को उसकी ज़रूरत थी.

औरत का क्रोध एक ज्वालामुखी के समान होता है, महीनों से जो भावनाएँ ह्रदय में दबा के रखी थी, वह उस पूर्णिमा की रात उबलते हुए लावा की तरह बह निकलीं. घर वालों की विनती के बावज़ूद मैंने पारस को अपने बेटे से मिलने ना दिया. अस्पताल से जब छुट्टी मिली तो सीधा मायके चली गयी, पारस ने भी अधिक आपत्ति नहीं दिखाई, शायद कहीं ना कहीं वो भी शादी के दायित्व से मुक्ति चाहता था.

मेरे अगले कुछ साल सुहास की परवरिश में ना जाने कब बीत गए, सुनने में आया की पारस दिल्ली छोड़ के शिमला में बस गया. कुछ हफ्तों पहले डाक में एक किताब आयी, शीर्षक था “सन्नाटा”, और लेखक का नाम पारस शर्मा. एक बार को मन किया कि किताब को आग में भस्म कर दूँ, पर उत्सुकता भी थी कि इतने सालों के बाद पारस क्या कहना चाहता है. मैं अगली सुबह वो किताब पढ़ने बैठी तो रात तक पढ़ती ही रही, दूसरों के लिए वह किताब भले ही एक कहानी मात्र हो पर दरअसल वह पारस की ओर से मेरे लिए एक पांच सौ पन्नो का सन्देश था. कहानी का प्रमुख पात्र भी अपने काम में इतना खोया रहता था कि उसे भीड़ में भी सन्नाटा सुनाई पड़ता, और इसी बहरेपन के कारण वह अपना सब कुछ गँवा बैठा, अब वह पश्चाताप की आग में अकेले जल रहा था.अगर मैं अभी भी बाईस साल की वह रोमानी खयालातों वाली लड़की होती दो झट से पारस को पुनः स्वीकार लेती, मगर पारस की लेखनी की स्याही ने मुझे कई साल पहले ही जीवन की असल कालिख से परिचित करा दिया था.

दो दिन बाद फ़िर से डाक में पारस ने कुछ भेजा. वही काली डायरी जो एक ज़माने में मेरे लिए सौतन समान थी. वह मोटी डायरी अब लगभग पूरी तरह से पारस की सुन्दर लिखावट से संवर चुकी थी मगर मुझे अब उसको पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं अनायास ही पन्ने पलटती गयी, अचानक मुझे दो पन्नो के बीच में सुहास की एक तस्वीर मिली जो शायद पारस ने अपनी माँ से प्राप्त करी होगी. तस्वीर के पीछे पारस ने सुहास के लिए एक लोरी समान कविता लिखी थी, कविता को पढ़कर ऐसा लगा की पहली बार पारस ने किसी अन्य की संवेदनशीलता को समझा था, पहली बार उसने किसी और के लिए कुछ लिखा था.

आज इस दम घोटने वाली मारुती में अपने बेटे को एक मुलायम रज़ाई में लपेटकर मैं उसके पिता से मिलाने ले जा रही हूँ. शायद पारस और सुहास को सदैव एक दूसरे से दूर रखना दोनों के साथ नाइंसाफी होगी. आज एक बाप और बेटे का मिलाप होगा, परन्तु मेरा उस पारस से मिलना, जिसने मुझे पांच साल पहले मोहित किया था, असंभव है, क्यूंकि वह पारस तो कभी वास्तविक था ही नहीं, वह महज़ मेरी एक कल्पना थी. अपने भ्रमित विचारों के कारण मैं उसे कुछ और ही समझ बैठी थी – मेरी रचनात्मकता का भी जवाब नहीं, शायद मुझे भी एक लेखिका होना चाहिए था.

 

 

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