अम्मा

अम्मा

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अम्मा की बिंदी, कभी गुसलखाने के शीशे पर भाप में भीगती हुई,
तो कभी उनकी साड़ी की सिलवटों में छिपी हुई,
एकाएक उनकी हँसी के साथ चमक उठती थी.
मैं उस चमक को लपक कर अपनी मुट्ठी में समेट लेती,
जब भरी दोपहर में अम्मा की आँख लग जाती,
तब चुपके से उस बिंदी को अपने माथे पर सजाती,
और कुछ पलों के लिए मैं ही मानो अम्मा बन जाती.

अम्मा की नीले रंग की ज़री वाली बनारसी साड़ी,
ना जाने मैंने कितनी बार अपनी नन्ही सी कमर पर लपेटी होगी.
कठिनाई से पल्लू सँभालते हुए,
जब लड़खड़ाती सी कमरे के बाहर आती,
तब अम्मा खिलखिला कर हँस पड़ती.
वही साड़ी जब आज पहनी तो अम्मा की आँखें छलक गयीं,
बोली, “बिटिया तू और बड़ी मत होना अब”.

अम्मा के घुंघराले बाल उनकी कान की बालियों में उलझ जाते थे,
कभी परदों की बीच की धूप में धूल के कड़ों के साथ जगमगाते थे,
कभी तकिये के गिलाफ़ की सफ़ेदी में भंग डालते हुए,
तो कभी बगीचे के किसी गमले में बिखरे हुए मिल जाते थे.
उन्हीं घुंघराले बालों की छाँव में कभी परियों की कहानी,
तो कभी मीठी लोरी सुना करती थी,
क्यूंकि बिना मुझे सुलाए अम्मा की आवाज़ कहाँ थका करती थी.

अम्मा का पसीना, सिलबट्टे पर चटनी पीसते पीसते,
मोतियों की तरह माथे पर उभर आता था.
कभी धूप में घंटो पापड़ सुखाते सुखाते,
अम्मा के ब्लाउज़ को भिगो जाता था.
कभी जब अम्मा अनायास ही ना जाने क्या सोचकर रो देतीं,
तब चुपके से गाल पोंछते हुए दबे स्वर में बोलती,
“अरे नहीं बिटिया, ये आंसू नहीं, ये तो पसीना है”.

अम्मा के सपने, मासूम कोपल जैसे,
पांच दिन की छुट्टी में बिटिया को सौ पकवान खिलाना,
बाबा को ज़बरदस्ती चारों धाम लेकर जाना,
अपने बगीचे में हर रंग के गुलाब उगाना.
अम्मा कुछ नहीं जानती, ये आजकल की दुनियादारी,
पर इस दुनिया से वाकिफ़ बिटिया को जब भी कोई ठोकर लगती है,
दर्द में मुंह से बस एक ही शब्द निकलता है – “अम्मा”.

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चौखट

चौखट

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जब महेश पहली बार सुनीता को अपने गांव लेकर आया तब अपनी नयी देवरानी को देखते ही निर्मला की आँखें फटी की फटी रह गयी. शिफॉन की चटख गुलाबी साड़ी में सुनीता किसी चलचित्र की अभिनेत्री से कम नहीं लग रही थी. एक खिलता हुआ गुलाब उसके घुंघराले बालो के सौंदर्य को और भी बढ़ा रहा था और उसके लम्बे नाखूनों पर सुर्ख लाल रंग की नेल पॉलिश चमक रही थी. वहीँ निर्मला के बालों को उसका दो साल का बेटा छोटू गोद में लटके लटके बिखेर चुका था और उसके नाखून, जोकि बर्तन धोते धोते घिस चुके थे, उनमें हल्दी का पीलापन साफ़ दिखाई दे रहा था. अपने बालों को फुर्ती से ठीक करते हुए और अपनी सादी सूती साड़ी की प्लेटें पुनः बनाकर निर्मला ने नयी बहू का आरती के साथ घर की चौखट के इस पार स्वागत कर तो लिया मगर पल्ले में बंधे एक पचास के नोट को उसके हाथ में थमाते हुए यह सोचा की इस शहरी बहू को शगुन देने का क्या फायदा जिसको गृहस्थी क्या होती है पता ही नहीं होगा.

निर्मला का भय निराधार भी नहीं था, सुनीता शहर में पली बढ़ी, एक प्रख्यात कलेक्टर की बेटी थी. वह इतने स्वतंत्र और आधुनिक खयालातों वाली लड़की थी कि अपने सहपाठी से ब्याह रचाने का फैसला भी उसने स्वयं ही कर लिया. महेश और सुनीता की शादी शहर में ही हुयी थी, तब निर्मला नें शादी में शामिल होने से इंकार कर दिया था – यह बोलकर कि छोटू को इतनी दूर ले जाना उचित नहीं होगा, परन्तु मन ही मन तो उसे यह डर खाये जा रहा था कि अगर वह उस शादी में शामिल हुयी तो उसकी स्वर्गवासी सास की आत्मा अपनी बड़ी बहू पर बेहद रोष प्रकट करेगी. लेकिन अब जब शादी हो ही गयी थी तो निर्मला को सुनीता को अपनी देवरानी के रूप में स्वीकारना ही पड़ा, पर देवरानी भी ऐसी जिसकी नाज़ुक कलाई में करछी पकड़ते ही बल पड़ जाता और पानी की एक बालटी उठाने में ही कमर में मोच आ जाती. निर्मला को लगता मानो उसने एक और बच्ची गोद ले ली हो.

निर्मला एक सादे विचारों वाली स्त्री थी, उसको सुनीता के रूप रंग और परवरिश से कोई ईर्ष्या नहीं थी, परन्तु सुनीता का फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना, छोटू को कहानी की किताबें पढ़कर सुनाना और अंग्रेजी के अक्षर लिखना सिखाना निर्मला को बहुत खलता था. निर्मला के लिए काला अक्षर भैंस बराबर था, अपने पिताजी से उसे यही शिकायत थी कि जहाँ उन्होंने उसके भाइयों की शिक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी, वहीँ अपनी बेटी को कभी भी शिक्षा योग्य नहीं समझा. उसने घर की चौखट लाँघी तो सिर्फ ससुराल में कदम रखने के लिए, जहाँ उसके पढ़े लिखे होने की कोई आवश्यकता नहीं थी, जहाँ उसका अस्तित्व बस चूल्हा जलाने और कपड़े धोने तक सीमित था.

सुनीता जब व्यापार के हिसाब किताब में महेश की सहायता करती और लेन देन सम्बंधित कार्यों के लिए पास के शहरों में जाती तब निर्मला यह सोचती की अगर वह भी किसी कलेक्टर के घर जन्मी होती तो आज उसके भी तितलियों के समान पर होते. जब सुनीता बाहर जाती तब निर्मला चुपके से उसके कमरे में घुसकर उसके उपन्यासों के पन्नों को बड़ी उत्सुकता से पलटती, कभी स्याही को सूंघती तो कभी अपनी उँगलियों से एक एक अक्षर को सहलाती. उन चंद पलों में उसे न तो कुकर की सीटी सुनाई देती और न ही छोटू की पुकारें, जब पुनः सचेत होती तब खुद पर शर्म भी आती और क्रोध भी – “ऐसे बुत की तरह किताब को देखने से कोई पढ़ना थोड़ी न सीख जाता है” – वह खुद को डांटते हुए रसोई की ओर भागती.

एक दिन सुनीता शहर से जल्दी वापस आ गयी और अपनी जेठानी को किताबों के संदूक का निरीक्षण करते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया. निर्मला झेंप कर बिना कुछ बोले तेज़ी से कमरे के बाहर चली गई. मामला नाज़ुक था, मगर निर्मला की किताब को उलटा पकड़कर एकटक घूरने वाली छवि बार बार सुनीता के ज़हन में आती रहती, इसलिए उसने एक दिन निर्मला से धीमी आवाज़ में पूछ ही लिया – “भाभी आप को पढ़ना सीखना हैं? मैं सिखा सकती हूँ”.

उस दिन से रोज़ शाम को खाना चढ़ाने के बाद निर्मला सुनीता से पढ़ना लिखना सीखने लगी. जिन हाथों को बस सर्फ़ के पानी नें छीला और चूल्हे की गर्मी नें झुलसाया था उन हाथों में जब एक कलम आयी तो लेखनी से न जाने कितने अनकहे शब्द फूट पड़े. निर्मला आधी रात को उठकर चुपके से एक नोटबुक में अपने जीवन के रोचक किस्सों के बारे में लिखती, और इस कार्य से उसे इतनी ख़ुशी मिलती की वह पहली बार एक सम्पूर्ण नारी होने का गर्व महसूस करने लगी.

एक मई की दोपहर, जब घर में छोटू और निर्मला के अलावा कोई नहीं था तब गाँव के साहूकार नें मकान के दरवाज़े पर दस्तक दी. अंदर आकर पानी के दो गिलास पीने के बाद जब साहूकार जी को गर्मी से थोड़ी राहत मिली तब उन्होंने निर्मला को बताया कि वह उसके पति द्वारा लिए गए एक ब्याज का सूत वसूल करने आये हैं और अगर पैसे उसी दिन नहीं दिए गए तो अनुबंध के अनुसार दुगना सूत भरना पड़ेगा. जब साहूकार जी नें बोला की सूत की कीमत दस हज़ार रुपये है तब पहले तो निर्मला सकपका गयी – उसके पति ४-५ दिन के बाद ही लौटने वाले थे और घर में इतनी बड़ी नगद राशि थी भी नहीं – फिर खुद को थोड़ा संभाल कर और जितना लेन देन के बारे में सुनीता से सीखा था वह याद करते हुए निर्मला नें अनुबंध के कागज़ात देखने का अनुरोध किया. साहूकार जी पहले तो इस निवेदन पर हँस पड़े, मगर जब देखा की निर्मला हाथ बढ़ाये खड़ी हैं तो असमंजस से कागज़ात उसके हाथ में थमा दिए. निर्मला पढ़ने में माहिर हो चुकी थी, उसने चंद मिनटों में ही यह समझ लिया की साहूकार एक हज़ार की जगह दस हज़ार रुपये मांग रहा हैं. वह अंदर के कमरे से एक हज़ार रुपये लेकर आयी और साहूकार के हाथ में थमाते हुए बोला “साहूकार जी, अब इस गाँव में भी पढ़ी-लिखी लड़कियाँ रहने लगी हैं, आप हमारी आँखों में धूल नहीं झोंक पाओगे”. साहूकार नें पैसे लिए और झेंपते हुए घर से रवाना हो गया. दरवाज़ा बंद करते हुए निर्मला की नज़र घर की चौखट पर पड़ी – वह चौखट जो निर्मला को पहले बेड़ियों समान लगती थी, आज उसके चातुर्य की दाद दे रही थी. 

सन्नाटा

सन्नाटा

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हमारी सफ़ेद रंग की मारुती जैसे ही रफ़्तार पकड़ के शिमला से कुफरी की ओर बढ़ी, शरीर में एक ठिठुरन सी महसूस होने लगी. नवंबर की इस सर्दीली शाम के सामने मेरी पतली शाल दुर्बल साबित हो रही थी. मेरा जैकेट गाड़ी की डिक्की में था. दिल्ली से हमने जो ड्राइवर भाड़े पे लिया था वो तेज़ गति से गाड़ी को चला, या लगभग उड़ा ही रहा था. जब मैंने उसे गाड़ी दो मिनट के लिए रोकने को बोला, वो झुंझला उठा. मन मसोस के तक़रीबन २ किलोमीटर आगे पहुंचने के बाद उसने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी परन्तु इंजन फिर भी बंद नहीं किया. मैं ड्राइवर की अधीरता से सहम के, फुर्ती से गाड़ी से उतरी और डिक्की की ओर लपकी. जैसे ही जैकेट को बदन पे लपेटा, भीषड़ ठण्ड से तो राहत मिली परन्तु दम भी घुटने लगा. एक तो छोटी सी गाड़ी जिसके सभी शीशे कोहरे को बाहर रखने के लिए पूर्ण रूप से बंद थे, और ऊपर से पहाड़ी इलाके की वो घुमावदार सड़के जिनपे हमारी मारुती प्रकाश की गति से आगे बढ़ रही थी – मेरा सिर चकराने लगा. ड्राइवर को पुनः रोकने के लिए बोलना उचित नहीं लगा तो मैंने खुद को विचलित करने के लिए अपनी आँखें मूँद ली और यादों के समुन्दर में गोता मारा. बंद नेत्रों के परदे पे पारस के चेहरे का धुंधला प्रतिबिम्ब प्रकट हुआ. यह वही पारस था जिससे मेरी पहली मुलाकात हिमाचल की इन्हीं वादियों में तक़रीबन पांच साल पहले हुयी थी.

सुडौल शरीर, प्यारी मुस्कान, और चंचलता से भरी आँखें थी पारस की, मगर उनके नीचे जो काली झाइयां थी वह न जाने कितनी अनकही बातें अपने अंधकार में समेटे हुयी थीं. पहली ही मुलाकात में मुझे पारस एक समुन्दर के समान लगा, सतह पे एक शिशु की तरह मासूम मगर भीतर से गंभीर और रहस्यमयी. मैं तब कुछ बाईस साल की रही होंगी, रोमानी ख़यालातो वाली, और गुत्थियां सुलझाना तो मुझे बचपन से ही बहुत भाथा था, इसी कारणवश पारस ने मेरा मन मोह लिया. हमारा परिवार गर्मी की छुट्ठियो में हर साल दिल्ली की तपन को पीछे छोड़ किसी पहाड़ी इलाके में पनाह लेता था, यह तो इत्तेफाक की ही बात थी की उस साल पिताजी के अज़ीज़ मित्र, पारस के पिता ने भी कुफरी की बर्फीली पहाड़ियों में अपने परिवार के साथ मई का महीना बिताने की योजना बनाई थी. हर सुबह हम दोनों के परिवार साथ में ही हिमाचल के जंगल, मंदिर, और असीम सुंदरता से परिपूर्ण दृश्यों का लुत्फ़ उठाने निकल पड़ते. जहां सभी परिवारजनों की नज़रे शिमला की हरियाली और दूर क्षितिज के पास खड़े, धूप में पिघलती हुयी बर्फ के अंतिम अवशेषों की सफ़ेद चादर ओढ़े हुए पर्वतो पे होती, वही मेरी नज़र एकटक पारस के ह्रदय तक पहुंचने का प्रयास करती, जबकी पारस तो कहीं और ही होता. वह ना तो शिमला के सौंदर्य से प्रफुल्लित दिखता, ना ही मेरे एकतरफे आकर्षण से वाकिफ़ मालूम देता, पारस अपने ही खयालो में मशगूल रहता, वर्तमान से कहीं दूर, शायद अपने बीते हुए कल की कुछ गलियों में.

हमारे परिवार में बेटियों को अपना वर चुनने पर पाबन्दी थी, इसी कारणवश, मेरी पारस को लेकर उत्सुकता, जो की मेरी माँ की अनुभवी निग़ाहों ने आसानी से भांप ली थी, उनके लिए अपार चिंता का कारण बन गयी. यह चिंता जब उन्होंने पिताजी से व्यक्त करी तो उन्होंने सोचा की इससे पहले की उनकी बागी बेटी कुछ गलत कर बैठे, क्यों ना वह खुद ही मेरे और पारस के रिश्ते का प्रस्ताव पारस के घर वालों के पास लेकर जाएं. रिश्ता एक हफ्ते में पक्का भी हो गया, विवाह की तिथि ३ महीने बाद की तय करी गयी. पता नहीं पारस ने इस रिश्ते के लिए हाँ क्यों कहा, शायद उससे पूछा ही नहीं गया, या फिर वह अपने परिवार वालों के सामने झुक गया.

पारस के आँखों के पीछे छिपा हुआ रहस्य मुझे शादी के बाद पता चला. वह ना तो अतीत की गलियों में खोया हुआ था और ना ही किसी भयावने हादसे का बोझ उठाते हुए जी रहा था. वह तो साहित्य का प्रेमी था, बिना किसी को बताये, आधी रात को उठके कहानियाँ लिखा करता था. वह कभी भी मेरे साथ कोई दुर्व्यहवार नहीं किया, एक पति और एक मित्र का रिश्ता वह बखूबी से निभाता, मगर कभी कभी ऐसा लगता की उसकी कहानी की नायिका उसको मेरे से दूर खींच रही है. जहां मैं उसकी बाहरी मासूमियत और भीतरी गंभीरता, दोनों से मोहित थी, यह अलगाव मुझसे सहा नहीं जाता था. मैं उसकी कहानियों के चरित्रों से मिलना चाहती थी, उसकी वह काली डायरी, जिसमे वह अपने शब्दों से रोचक किस्से बुना करता था, मुझे रोज़ पुकारती थी, शायद मेरा मज़ाक भी उड़ाती थी, शायद यह कहती थी मुझसे कि तुम कितनी भी कोशिश कर लो, पारस के सबसे ज़्यादा करीब तो सदा मैं ही रहूँगी. पूर्णिमा की उस रात जब हमारे बेटे सुहास के जन्म के कुछ घंटे पहले मैं दर्द से तिलमिला के पारस का नाम पुकार रही थी तब भी वह अपनी लाइब्रेरी में अपनी डायरी से गुफ़्तगू कर रहा था. अपनी शब्दों की दुनिया में वह ऐसा खोया हुआ था की उसे मेरा भी होश नहीं था. जैसे तैसे मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और वह एम्बुलेंस लेके घर आयीं, तब जाके पारस इस दुनिया में वापस आया जहां उसके परिवार को उसकी ज़रूरत थी.

औरत का क्रोध एक ज्वालामुखी के समान होता है, महीनों से जो भावनाएँ ह्रदय में दबा के रखी थी, वह उस पूर्णिमा की रात उबलते हुए लावा की तरह बह निकलीं. घर वालों की विनती के बावज़ूद मैंने पारस को अपने बेटे से मिलने ना दिया. अस्पताल से जब छुट्टी मिली तो सीधा मायके चली गयी, पारस ने भी अधिक आपत्ति नहीं दिखाई, शायद कहीं ना कहीं वो भी शादी के दायित्व से मुक्ति चाहता था.

मेरे अगले कुछ साल सुहास की परवरिश में ना जाने कब बीत गए, सुनने में आया की पारस दिल्ली छोड़ के शिमला में बस गया. कुछ हफ्तों पहले डाक में एक किताब आयी, शीर्षक था “सन्नाटा”, और लेखक का नाम पारस शर्मा. एक बार को मन किया कि किताब को आग में भस्म कर दूँ, पर उत्सुकता भी थी कि इतने सालों के बाद पारस क्या कहना चाहता है. मैं अगली सुबह वो किताब पढ़ने बैठी तो रात तक पढ़ती ही रही, दूसरों के लिए वह किताब भले ही एक कहानी मात्र हो पर दरअसल वह पारस की ओर से मेरे लिए एक पांच सौ पन्नो का सन्देश था. कहानी का प्रमुख पात्र भी अपने काम में इतना खोया रहता था कि उसे भीड़ में भी सन्नाटा सुनाई पड़ता, और इसी बहरेपन के कारण वह अपना सब कुछ गँवा बैठा, अब वह पश्चाताप की आग में अकेले जल रहा था.अगर मैं अभी भी बाईस साल की वह रोमानी खयालातों वाली लड़की होती दो झट से पारस को पुनः स्वीकार लेती, मगर पारस की लेखनी की स्याही ने मुझे कई साल पहले ही जीवन की असल कालिख से परिचित करा दिया था.

दो दिन बाद फ़िर से डाक में पारस ने कुछ भेजा. वही काली डायरी जो एक ज़माने में मेरे लिए सौतन समान थी. वह मोटी डायरी अब लगभग पूरी तरह से पारस की सुन्दर लिखावट से संवर चुकी थी मगर मुझे अब उसको पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. मैं अनायास ही पन्ने पलटती गयी, अचानक मुझे दो पन्नो के बीच में सुहास की एक तस्वीर मिली जो शायद पारस ने अपनी माँ से प्राप्त करी होगी. तस्वीर के पीछे पारस ने सुहास के लिए एक लोरी समान कविता लिखी थी, कविता को पढ़कर ऐसा लगा की पहली बार पारस ने किसी अन्य की संवेदनशीलता को समझा था, पहली बार उसने किसी और के लिए कुछ लिखा था.

आज इस दम घोटने वाली मारुती में अपने बेटे को एक मुलायम रज़ाई में लपेटकर मैं उसके पिता से मिलाने ले जा रही हूँ. शायद पारस और सुहास को सदैव एक दूसरे से दूर रखना दोनों के साथ नाइंसाफी होगी. आज एक बाप और बेटे का मिलाप होगा, परन्तु मेरा उस पारस से मिलना, जिसने मुझे पांच साल पहले मोहित किया था, असंभव है, क्यूंकि वह पारस तो कभी वास्तविक था ही नहीं, वह महज़ मेरी एक कल्पना थी. अपने भ्रमित विचारों के कारण मैं उसे कुछ और ही समझ बैठी थी – मेरी रचनात्मकता का भी जवाब नहीं, शायद मुझे भी एक लेखिका होना चाहिए था.

 

 

The One-Eyed Warrior

The One-Eyed Warrior

She lost one eye to glaucoma,

The same year that she lost her husband,

What she did not lose throughout the ordeal

Were her courage, her spark, and her sense of humour.

“It is easier to thread a needle with one eye.”

She chuckled at the pun with utmost glee.

Two one-eyed warriors on a wicker chair,

One piercing the fabric of time,

While the other impaled 4 layers of cotton.

~

“One can dream just as well with just one eye.”

Grandma enjoyed the most restful sleep.

It was the only time her needle would get a break

From creating beautiful blooms on barren cloth.

Her nimble fingers would never stop moving,

As yards of thread curled up to create intricate art.

Her embroidery was her way to unwind with the thread,

To conceal her sorrows and struggles

In the web of shiny and colourful yarn.

~

Her needle was more potent than a paint brush.

Her tablecloths and bed sheets told stories

Of the gardens and rooftops from her childhood.

They were adorned with caricatures

Of furry pet dogs and goats, long dead.

If you looked closely, you would find her too,

A girl in a pink frock, with two pigtails.

Her face looked different but her smile was the same,

Broad and cheerful, a few teeth missing.

~

Her vision became foggy as the days went by,

The tremors and trembles of old age arrived.

She still kept sewing sequins on Mother’s saris,

And darning the holes in our socks.

She slipped into a coma the day she finished her masterpiece,

A portrait of her family embroidered on blue silk.

Do not place a white shroud over her just yet,

Place an unmonogrammed handkerchief by her side instead,

I am sure that the one-eyed warrior will rise again.

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~ The Creatures Of The Night ~

~ The Creatures Of The Night ~

If you are courageous enough to venture out after midnight in a small Indian town, you will be greeted by the creatures of the night. Your first companions will be the stray dogs with limp tails, their eyes glinting in the dark, their noses leading them to their late night snack. They scavenge through the piles of rotting garbage while their fortunate pure-bred counterparts enjoy a snooze in their marble palaces. Look up and you will find flappy wings in the sky as large bats try to cast a shadow on the moon. Don’t get startled by the shrieks of the owls, they are less dangerous than the silent serpents in the grass.

 

You might find a seemingly abandoned pair of slippers by the side of the road, don’t steal them, their owner still lives. Look inside the concrete pipes and under the heap of polythene sheets, you will find a tired rickshaw puller sleeping barefoot and possibly bare-chested. He has moved to the town from the village, to send back money for his siblings. You will notice blisters on his palms and wrinkles on his face but he will be smiling while he is asleep. In fact, don’t try to find him, let him rest until the sun announces a new morning of back-breaking labour.

If the town is big enough to boast of an ATM, there will be a group of youngsters a few feet away. Far enough from the peripheral vision of the drowsy guard yet close enough to steal some light from the vestibule, the privileged progeny of the rich merchants enjoys a party on the footpath. Leaning against their motorbikes or lying down on the boots of their cars, they laugh at a vulgar joke while draining the last drop from their beer bottles. Why they need to congregate in the middle of the night is a mystery to all but them. Perhaps at the centre of the huddle are secret lovers who cannot meet in broad daylight or maybe they just prefer the taste of the Biryani sold by the stall that opens for business after dark.

You can stand and judge these creatures of the night or can walk towards the innocent looking houses. Over the chirping of the crickets, you will hear the moans of a battered housewife as she is brutally whipped by her drunken husband. The wind might carry the whimpers of a woman abused by her own kin or the sobs of a bullied child who doesn’t want to face another day at school. If you stay really quiet you will hear the creaking of the beds, the rolling of the tears, and the whispers of protest. The creatures of the night do not just haunt the streets.

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The Girl In The Glass Chamber

The Girl In The Glass Chamber

She lives in a chamber made of glass,

Transparent walls constructed by puberty.

This magical glass restricts her motion,

Though others can walk through as if it is air.

The world flings numerous words at her,

Questions, accusations, and insults.

She screams that she is injured,

They demand to see her wounds,

But the bruises on her brain cannot be revealed.

They do not see the glass,

They cannot feel its coldness.

They blame her for not spreading her wings,

For not taking flight and exploring the unknown.

Little do they know that each time she attempts to soar,

She crashes against the invincible glass,

That does not crack but shatters her soul.

They call her feeble and lethargic,

They know not how hard she tries to breathe.

They say she gives up too easily,

Complains too much and smiles too little.

All this while the pain and panic wring her nerves,

And yet she chooses not to whimper.

She can’t break through but you can get in,

Be cautious and tread gently.

Perhaps two can break the glass together,

One poisonous shard at a time.

When summer comes and the sun glows bright,

The color of her cheeks may return.

And the warmth of love could evaporate,

The dark shadows lurking in her mind.

Show her that the world is a kinder place

Than her nightmares force her to believe.

Throwing stones at the chamber from the outside

Only makes its deadly grasp more fatal.

I hope that you liked this poem dedicated to mental health awareness. I also post these articles and many others to my Niume profile, check it out here.

The Wire Mesh

The Wire Mesh

Whenever the dust settled after an afternoon storm, the sweet seller arrived at my doorstep with a guilty smile on his bearded face. He would sit in the verandah for about an hour, carefully blowing away the red mud from the surface of the homemade sweetmeats. I often asked him how he could live with selling those contaminated sweets but he claimed that the earthiness enhanced their flavour. Despite this clever justification, he would always keep my batch at the bottom of his bag, cautiously wrapped in butter paper.

Feelings diffused through the wire mesh of my front door, creating a wonderful harmony on each side. I was sheltered yet troubled while he was wild and raw but frightened of overstepping the boundaries defined by society. He was so afraid of disturbing the fragile balance of this friendship that he always left my bundle of sweets at the door. The risk of the dream ending with an accidental brush of fingertips made him insist on keeping the barrier of the wire mesh between us at all times.

Whenever I asked him about his family, he would cheesily remark that in this city I was all he had.  This response was not unfair considering that he never questioned the absence of another soul in a bungalow that was clearly not meant for one. Our sporadic encounters were enough for love to blossom in our youthful hearts. With no means of contacting him, I would pray for a storm whenever I yearned for his company. He would magically appear from behind the murky curtain of smog, his tray of sweets dangling from his neck, his hands behind his back as if they were holding a message that he was too shy to deliver.

Ours was a language of silence, of subdued smiles and unheard whispers. He knew nothing about the world that existed beyond the shadows of my drawing room but he knew everything about me. Softly humming my favorite song, he would display the sweet treat of the day as if it was a painting expressing his love. Layers of powdered sugar always embraced his thick fingers that were evidently meant for a hardier profession than brewing syrups. It almost seemed like he was running away from his past, trying to hide his pain in the whirls of his Jalebis, concealing the blemishes with thin slices of almonds.

His gentle voice would echo through the empty house until the next storm brought him my way. Years passed, neighbours changed, the paint of the bungalow started peeling in places, but the taste of his Coconut Barfi remained the same. Not all storms are the harbingers of happy times though. Unfortunately, I had to learn this lesson the hard way.

One night the thunder shook the house and the pouring rain didn’t cease for hours. As the feeble rays of the rising sun struggled to pierce through the shroud of clouds, I heard a strange metallic clang at my door. There he was, wet, pale and cold. This storm was one that he could not defeat. His tray of sweets still couldn’t manage to breach the boundary that had kept us apart for years.

I hope that you enjoyed this short story. I also post these articles and much more on my Niume profile, check it out here.